(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.27. अध्यायः 027
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
गरुडेन शैलाग्रे उपविश्य गजकच्छपयोर्भक्षणम्॥ 1 ॥ ततः स्वर्गेऽमृतसमीपं गतेन तेन तत्र परितो ज्वलदग्निदर्शनभया********* प्रति तच्छमनोपायप्रश्नः॥ 2 ॥ ब्रह्मणा तम्प्रति नवनीतप्रक्षेपेणाग्निसंशामनचेदना॥ 3 ॥


Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

`भीष्म उवाच।

हत्वा तं पक्षिशार्दूलः कुविन्दानां जनं व्रती।
उपोपविश्य शैलाग्रे भक्षयामास तावुभौ।
वारणं कच्छर्प चैव संहृष्टः स पतत्रिराट्॥ 13-27-1(81950)
तयोः स रुधिरं पीत्वा मेदसी च परन्तप।
संहृष्टः यततांश्रेष्ठो लब्ध्वा बलमनुत्तमम्।
जंगाम देवराजस्य भवनं पन्नगाशनः॥ 13-27-2(81951)
तं प्रणम्य महात्मानं पावकं विस्फुलिङ्गिनम्।
रात्रिदिवं प्रज्वलितं रक्षार्थममृतस्य ह॥ 13-27-3(81952)
तं दृष्ट्वा विहगेन्द्रस्य भयं तीव्रमुपाविशत्।
नतु तोयान्न रक्षिभ्यो भयमस्योपपद्यते॥ 13-27-4(81953)
पक्षित्वमात्मनो दृष्ट्वा ज्वलन्तं च हुताशनम्।
पितामहमथो गत्वा ददर्श भुजगाशनः॥ 13-27-5(81954)
तं प्रणम्य महात्मानं गरुडः प्रयताञ्जलिः।
प्रोवाच तदसन्दिग्धं वचनं पन्नगेश्वरः॥ 13-27-6(81955)
उद्यतं गुरुकृत्ये मां भगवन्धर्मनिश्चितम्।
विमोक्षणार्थं मातुर्हि दासभावादनिन्दितम्॥ 13-27-7(81956)
कद्रूसकाशममृतं मयाहर्तव्यमीश्वर।
तदा मे जननी देव दासभावात्प्रमोक्ष्यते॥ 13-27-8(81957)
तत्रामृतं प्रज्वलितो नित्यमीश्वर रक्षति।
हिरण्यरेता भगवान्पाकशासनशासनात्॥ 13-27-9(81958)
तत्र मे देवदेवेश भयं तीव्रमथाविशत्।
ज्वलन्तं पावकं दृष्ट्वा पक्षित्वं चात्मनः प्रभो॥ 13-27-10(81959)
समतिक्रमितुं शक्यः कथं स्यात्पावको मया।
तस्याभ्युपायं वरद वक्तुमीशोऽसि मे प्रभो॥ 13-27-11(81960)
तमब्रवीन्महाभाग तप्यमानं विहङ्गमम्।
अग्नेः संशमनोपायमुत्सयन्त पुनःपुनः॥ 13-27-12(81961)
पयसा शाम्यते वत्स सर्पिषा च हुताशनः।
शरीरस्थोपि भूतानां किं पुनः प्रज्वलन्भुवि॥ 13-27-13(81962)
नवनीतं पयो वाऽपि पावके त्वं समादधेः।
ततो गच्छ यथाकामं न त्वा धक्ष्यति पावकः॥' ॥ 13-27-14(81963)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सप्तविंशोऽध्यायः॥ 27 ॥

Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Footnotes

7-27-7 जानीहीति शेषः॥


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